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भोपाल में साहित्य, इतिहास और स्त्री विमर्श का संगम, ‘शिनाख्त: अग्निगर्भ में जलती पंखुरियां’ पर हुआ विशेष विमर्श

दुष्यंत कुमार पांडुलिपि संग्रहालय में आयोजित साहित्यिक विमर्श में देशभर के विद्वानों ने रखे विचार, डॉ. वीणा सिन्हा के चर्चित उपन्यास पर आधारित पुस्तक बनी चर्चा का केंद्र

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भोपाल | संवाददाता
राजधानी भोपाल में साहित्य, इतिहास और स्त्री विमर्श का एक विशेष संगम देखने को मिला, जब वरिष्ठ गायनेकोलॉजिस्ट एवं स्वास्थ्य विभाग से सेवानिवृत्त अपर संचालक डॉ. वीणा सिन्हा के चर्चित उपन्यास ‘अग्निगर्भ में जलतीं पंखुरियां’ पर आधारित पुस्तक ‘शिनाख्त: अग्निगर्भ में जलती पंखुरियां’ का लोकार्पण एवं साहित्यिक विमर्श आयोजित किया गया। यह कार्यक्रम मंगलवार को दुष्यंत कुमार पांडुलिपि संग्रहालय में आशा पारस फॉर पीस एंड हारमनी फाउंडेशन द्वारा आयोजित किया गया।

इस अवसर पर साहित्यकारों, आलोचकों और विद्वानों ने पुस्तक और उपन्यास के विभिन्न पहलुओं पर विस्तृत चर्चा की। उल्लेखनीय है कि इस पुस्तक में देशभर के 21 लेखकों ने साहित्यिक और शोधपरक लेखों के माध्यम से उपन्यास की समीक्षा और विश्लेषण प्रस्तुत किया है। पुस्तक का संपादन प्रो. आशा शुक्ला, डॉ. वीणा सिन्हा और रतन मणि लाल द्वारा किया गया है।

नालंदा को इतिहास नहीं, स्त्री विमर्श के रूप में देखती हैं डॉ. वीणा सिन्हा

कार्यक्रम के दौरान डॉ. वीणा सिन्हा ने कहा कि जब वे नालंदा के स्मारकों के सामने खड़ी होती हैं, तो उन्हें वे केवल ऐतिहासिक धरोहर नहीं बल्कि इतिहास में स्त्री विमर्श और समाज की परतों को समझने का माध्यम प्रतीत होते हैं। उन्होंने कहा कि वर्तमान में हमारा व्यक्तित्व इतिहास की स्मृतियों से निर्मित होता है और नालंदा की धरोहरें एक पूरे कालखंड की कहानी अपने भीतर समेटे हुए हैं।

साहित्यकारों ने रखे अपने विचार

राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त गजलकार अपर्णा पात्रीकर ने कहा कि लेखिका ने इतिहास के कालखंड में जाकर स्त्रियों के जीवन, उनकी पीड़ा और संघर्ष को महसूस करते हुए कहानी को बेहद संवेदनशील तरीके से प्रस्तुत किया है।

मध्य प्रदेश लेखिका संघ की पूर्व अध्यक्ष और साहित्यकार कुमकुम गुप्ता ने वैदिक काल में महिलाओं की भूमिका तथा उपन्यास की महिला पात्रों के संघर्ष को प्रमुखता से रेखांकित किया।

युवा फिल्मकार सुदीप सोहनी ने कहा कि यह कहानी इतिहास की दृष्टि से वीभत्स रस से शांत रस की ओर यात्रा कराती है। वहीं करुणा राजुरकर ने पुस्तक के शीर्षक की सराहना करते हुए कहा कि ‘शिनाख्त: अग्निगर्भ में जलती पंखुरियां’ शीर्षक पाठकों का ध्यान तुरंत आकर्षित करता है और लेखक ने पीड़ा के भाव को प्रभावशाली ढंग से उकेरा है।

नालंदा, बख्तियार खिलजी और इतिहास की नई दृष्टि

लेखक कुमार सुरेश ने कहा कि डॉ. वीणा सिन्हा ने एक वक्ता और दृष्टा की तरह ऐतिहासिक कालखंड की झलक प्रस्तुत की है। उन्होंने बताया कि उपन्यास बारहवीं-तेरहवीं शताब्दी के दौर, आक्रांता बख्तियार खिलजी और उस समय के सामाजिक-धार्मिक दायित्वों पर प्रकाश डालता है।

कवि एवं लेखक राग तेलंग ने कहा कि यह उपन्यास पाठकों को तर्क और भावनाओं की सीमाओं से परे लेकर जाता है। वहीं अखिल भारतीय लेखक परिषद की महामंत्री डॉ. साधना बलवटे ने कहा कि इतिहास को देखने के कई दृष्टिकोण हो सकते हैं और यह उपन्यास इतिहास को नए नजरिए से देखने की प्रेरणा देता है।

गंभीर अध्ययन और विश्लेषण का दस्तावेज

आचार्य प्रभुदयाल मिश्र ने इतिहास के पुनर्लेखन में प्रतिशोध की भावना से बचने की बात कही और कहा कि सत्य का साक्षात्कार निष्पक्ष दृष्टि से ही संभव है। फाउंडेशन की प्रो. आशा शुक्ला ने कहा कि डॉ. वीणा सिन्हा ने ऐतिहासिक और सामाजिक पक्षों पर गहन अध्ययन और विश्लेषण के बाद यह कृति पाठकों को सौंपी है।

बता दें कि पुस्तक का परिचय साहित्यकार लीलाधर मंडलोई ने लिखा है। पुस्तक में आचार्य प्रभुदयाल मिश्रा, अपर्णा पात्रीकर, कुमकुम गुप्ता, राग तेलंग, सुदीप सोहनी सहित कई प्रतिष्ठित लेखकों के लेख शामिल किए गए हैं।

कार्यक्रम का संचालन डॉ. विशाखा राजुरकर ने किया, जबकि शहर के कई प्रबुद्ध नागरिकों और साहित्य प्रेमियों की उपस्थिति ने आयोजन को विशेष बना दिया।

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