दिल्ली के स्टेट एम्पोरिया कॉम्प्लेक्स में शुरू हुआ हैंडलूम एंड हैंडीक्राफ्ट मेला
देश के अलग-अलग राज्यों के 60 से अधिक स्टॉलों पर हथकरघा, हस्तशिल्प और पारंपरिक कलाओं की विविधता

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त्योहारी मौसम के आगाज के साथ ही राजधानी दिल्ली के बाबा खड़क सिंह मार्ग स्थित स्टेट एम्पोरिया कॉम्प्लेक्स में भारतीय संस्कृति, कला, हथकरघा और हस्तशिल्प का अनूठा संगम देखने को मिल रहा है। आना हैंडलूम्स के तत्वावधान में आयोजित 12 दिवसीय ‘हैंडलूम एंड हैंडीक्राफ्ट मेला- दशहरा महोत्सव 2026’ का शुभारंभ हो गया है। यह मेला 8 से 19 अक्टूबर 2026 तक चलेगा।
मेले में देश के विभिन्न हिस्सों से आए कारीगरों और बुनकरों की पारंपरिक कला को एक ही छत के नीचे देखने और खरीदने का अवसर मिल रहा है। मेले के परिसर में प्रवेश करते ही अलग-अलग राज्यों की लोककला, पारंपरिक हुनर और हस्तनिर्मित उत्पादों की विविधता लोगों का ध्यान आकर्षित कर रही है। ग्रामीण क्षेत्रों और पारंपरिक बुनकर परिवारों द्वारा तैयार उत्पादों से सजे स्टॉलों के कारण पूरे परिसर में उत्सव जैसा माहौल बना हुआ है।
60 से अधिक स्टॉलों पर देशभर के पारंपरिक उत्पाद
दशहरा महोत्सव में देश के विभिन्न राज्यों से आए शिल्पकारों और बुनकरों के 60 से अधिक स्टॉल लगाए गए हैं। इनमें पारंपरिक हथकरघा वस्त्रों से लेकर घर की सजावट, कलात्मक वस्तुओं और खान-पान से जुड़े उत्पादों की विस्तृत श्रृंखला उपलब्ध है।
कश्मीर से आई आकर्षक पश्मीना शॉल, दक्षिण भारत की प्रसिद्ध कांजीवरम साड़ियां, बंगाल का तांत और बालूचरी सिल्क तथा बनारस की महीन जरीदार बनारसी साड़ियां महिला खरीदारों के बीच खास आकर्षण का केंद्र बनी हुई हैं।
मधुबनी पेंटिंग से लकड़ी और पत्थर की नक्काशी तक
मेले में कपड़ों के अलावा देश की समृद्ध लोक और हस्तशिल्प परंपरा की झलक भी देखने को मिल रही है। बिहार की प्रसिद्ध मिथिला यानी मधुबनी पेंटिंग्स लोगों को आकर्षित कर रही हैं। वहीं राजस्थान और उत्तर प्रदेश के कारीगरों द्वारा तैयार की गई नक्काशीदार लकड़ी और पत्थर की सजावटी वस्तुएं भी खरीदारों की पसंद बनी हुई हैं।

इसके अलावा धातु शिल्प, जूट से बने उत्पाद, मिट्टी, चीनी मिट्टी और शीशे के कलात्मक पात्र तथा घर की सजावट से जुड़ी अनेक वस्तुएं भी मेले में उपलब्ध हैं। बांस और घास से तैयार डलियां तथा अन्य घरेलू उपयोग की वस्तुओं की भी अच्छी मांग देखी जा रही है।
नवरात्रि को लेकर सूखे मेवों की भी बढ़ी मांग
मेले में पारंपरिक हस्तशिल्प के साथ-साथ खान-पान से जुड़े उत्पादों के स्टॉल भी लगाए गए हैं। प्राकृतिक तत्वों से तैयार पारंपरिक अचार और पापड़ के अलावा सूखे मेवों की विभिन्न किस्में भी यहां उपलब्ध हैं। नवरात्रि के अवसर पर सूखे मेवों के स्टॉलों पर लोगों की विशेष रुचि देखने को मिल रही है।
बिचौलियों के बिना कारीगरों को मिलेगा सीधा बाजार
आयोजक संस्था आना हैंडलूम्स के अध्यक्ष मो. बी. इस्लाम ने कहा कि मेले का मुख्य उद्देश्य देश के दूर-दराज क्षेत्रों में रहने वाले हुनरमंद दस्तकारों और बुनकरों को सीधे शहरी उपभोक्ताओं से जोड़ना है।
उन्होंने कहा कि बिचौलियों के बिना मिलने वाले इस मंच से ग्राहकों को प्रामाणिक उत्पाद उचित मूल्य पर उपलब्ध होते हैं, वहीं कारीगरों को भी उनकी मेहनत का उचित पारिश्रमिक सीधे मिलता है। इससे पारंपरिक कला और हुनर को आगे बढ़ाने में मदद मिलती है।
त्योहारी खरीदारी के लिए दिल्लीवासियों में उत्साह
संस्था के उपाध्यक्ष धर्मवीर सिंह ने कहा कि दशहरा और दीपावली के दौरान लोग घरों की सजावट और अपने प्रियजनों को उपहार देने के लिए हाथ से बनी पारंपरिक वस्तुओं को प्राथमिकता देते हैं। उन्होंने कहा कि मेले के पहले ही दिन दिल्लीवासियों का उत्साह देखने को मिला और आने वाले दिनों में बिक्री और बढ़ने की उम्मीद है।
वहीं संस्था के सचिव राम सिंह ने कहा कि देश के अलग-अलग हिस्सों से आए दस्तकारों और बुनकरों को सुविधाजनक मंच उपलब्ध कराना संस्था की प्राथमिकता है। उनका उद्देश्य है कि कारीगर बिना किसी परेशानी के अपनी कला का उचित मूल्य प्राप्त कर सकें।
सुबह 11 बजे से रात 8 बजे तक खुला रहेगा मेला
आयोजकों के अनुसार, मेले में आम जनता के लिए प्रवेश निःशुल्क है। मेला 8 से 19 अक्टूबर 2026 तक प्रतिदिन सुबह 11 बजे से रात 8 बजे तक खुला रहेगा। परिवार के साथ आने वाले लोग यहां त्योहारी खरीदारी के साथ-साथ देश के विभिन्न राज्यों की कला और लोकसंस्कृति को भी करीब से देख सकेंगे।
लोकसंस्कृतियों की प्रस्तुतियां भी बनेंगी आकर्षण
मेले में अलग-अलग राज्यों के कारीगर ग्राहकों से सीधे संवाद कर अपने उत्पाद बनाने की प्रक्रिया और पारंपरिक कला की बारीकियों के बारे में जानकारी दे रहे हैं। इसके साथ ही सांस्कृतिक कार्यक्रमों का भी आयोजन किया जा रहा है, जिनमें देश के विभिन्न हिस्सों की लोकसंस्कृतियों को प्रस्तुत किया जा रहा है।
इस तरह ‘हैंडलूम एंड हैंडीक्राफ्ट मेला- दशहरा महोत्सव 2026’ सिर्फ खरीदारी का केंद्र नहीं, बल्कि भारतीय लोककला, हथकरघा और पारंपरिक शिल्प को समझने और कारीगरों से सीधे जुड़ने का मंच भी बन रहा है। मेले के जरिए ‘वोकल फॉर लोकल’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ की भावना को भी मजबूती मिल रही है।

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