जननायक नहीं, राष्ट्रनायक हैं PM नरेंद्र मोदी: 25 वर्षों की शासन यात्रा -पीएस झा
गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में 2001 से शुरू हुई यात्रा ने 2014 में प्रधानमंत्री पद तक पहुंचकर भारत की विकास और शासन व्यवस्था को नई दिशा दी

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आज यानी सात अक्टूबर 2026 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शासन प्रमुख के रूप में 25 वर्ष पूरे हो रहे हैं। वर्ष 2001 में गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में शुरू हुई उनकी राजनीतिक यात्रा 2014 में प्रधानमंत्री कार्यालय तक पहुंची। तीन बार गुजरात की जनता ने उन्हें चुना और तीन बार देश की जनता ने प्रधानमंत्री के रूप में उन पर भरोसा जताया। जून 2026 में वे देश के सबसे लंबे समय तक लगातार पद पर रहने वाले निर्वाचित प्रधानमंत्री भी बने।
लोकतंत्र में इतनी लंबी राजनीतिक निरंतरता को केवल लोकप्रियता के आधार पर नहीं समझा जा सकता। भारतीय राजनीति ने अनेक ऐसे जननायक देखे हैं, जिन्होंने जनता की भावनाओं और समस्याओं को आवाज दी। लेकिन जननायक और राष्ट्रनायक के बीच एक महत्वपूर्ण अंतर है। जननायक जनता की आकांक्षाओं को स्वर देता है, जबकि राष्ट्रनायक उन आकांक्षाओं को राष्ट्र की दीर्घकालीन जरूरतों और राष्ट्रीय क्षमता से जोड़ने का प्रयास करता है।
जननायक से राष्ट्रनायक तक की यात्रा
भारतीय चिंतन में राष्ट्र को किसी एक व्यक्ति तक सीमित नहीं माना गया है। वैदिक वाक्य “माता भूमि: पुत्रोऽहं पृथिव्याः” राष्ट्र और नागरिक के बीच गहरे संबंध को व्यक्त करता है। इस दृष्टि से राष्ट्र भूमि, समाज, संस्कृति और सामूहिक दायित्व का विस्तार है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने सार्वजनिक जीवन में स्वयं को सत्ता के स्वामी के बजाय ‘प्रधान सेवक’ के रूप में प्रस्तुत किया है। अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति तक सरकारी योजनाओं और सुविधाओं की पहुंच सुनिश्चित करने का विचार इसी सेवा-भाव से जुड़ा है।
उनकी पुस्तक साक्षी भाव में व्यक्त संवेदनशीलता की भावना—दूसरों की पीड़ा को महसूस करने और समाज को भावनाओं से जोड़ने की बात—उनकी सार्वजनिक जीवन की उस दृष्टि को रेखांकित करती है, जिसमें शासन का अंतिम उद्देश्य नागरिक के जीवन में ठोस बदलाव लाना है।
विकास की अवधारणा में आया बदलाव
पिछले वर्षों में भारत की विकास आकांक्षा में भी बड़ा बदलाव देखने को मिला है। कल्याणकारी योजनाओं के लाभार्थी नागरिक से लेकर अपने भविष्य में सक्रिय भागीदारी करने वाले नागरिक तक का यह परिवर्तन नए भारत, आत्मनिर्भर भारत और विकसित भारत की अवधारणाओं में दिखाई देता है।
मेक इन इंडिया, उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजनाएं, कृषि और उससे जुड़े नए क्षेत्रों पर जोर, बुनियादी ढांचे का विस्तार तथा डिजिटल अर्थव्यवस्था जैसे क्षेत्रों में विकास का दायरा लगातार बढ़ा है।
भारत अब केवल अपनी घरेलू जरूरतों को पूरा करने वाली अर्थव्यवस्था तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि वैश्विक उत्पादन, तकनीक और आपूर्ति श्रृंखलाओं में अपनी भूमिका मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। यह बदलाव केवल आर्थिक नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आत्मविश्वास से भी जुड़ा है।
पांच कड़ियों वाली शासन-पद्धति
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 25 वर्षों का मूल्यांकन केवल योजनाओं और सरकारी फैसलों की संख्या से करना पर्याप्त नहीं होगा। उनकी शासन-पद्धति को पांच प्रमुख कड़ियों में समझा जा सकता है—
- समस्या की पहचान
- स्पष्ट दृष्टि और लक्ष्य
- नीति निर्माण
- प्रभावी क्रियान्वयन
- फीडबैक और निगरानी
यही वह व्यवस्था है, जिसे लेखक प्रेम शंकर झा ने अपनी पुस्तक ‘माडिफाइड गवर्नेंस’ में विस्तार से समझाने का प्रयास किया है।
इस दृष्टिकोण में शासन को एक सतत प्रक्रिया माना गया है, जिसमें समस्या से समाधान, समाधान से परिणाम और परिणाम से अगली नीति तक एक निरंतर चक्र बनता है।
समस्या से समाधान तक पहुंचने पर जोर
भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था में कई बार योजना पहले और समस्या बाद में सामने आती रही है। इसके विपरीत इस शासन-पद्धति में उन समस्याओं को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाने पर जोर दिखाई देता है, जो लंबे समय से करोड़ों लोगों के दैनिक जीवन को प्रभावित कर रही थीं।
खुले में शौच, रसोई के धुएं से महिलाओं का स्वास्थ्य प्रभावित होना, बैंक खाते का अभाव, सरकारी सहायता में बिचौलियों की भूमिका, घर तक नल का पानी नहीं पहुंचना और बीमारी के कारण परिवारों पर आर्थिक बोझ जैसी समस्याओं को राष्ट्रीय स्तर पर चिन्हित किया गया।
इसके बाद स्पष्ट और मापे जा सकने वाले लक्ष्य निर्धारित किए गए। खुले में शौच से मुक्ति, हर ग्रामीण घर तक नल का पानी और पात्र परिवारों तक योजनाओं की पहुंच इसी सोच के उदाहरण हैं।
जनधन, आधार और मोबाइल से बदला सरकारी सहायता का ढांचा
जनधन, आधार और मोबाइल की तिकड़ी ने सरकारी सहायता को सीधे लाभार्थियों तक पहुंचाने के लिए तकनीकी आधार तैयार किया। इससे प्रत्यक्ष लाभ अंतरण की व्यवस्था को मजबूती मिली और आगे डिजिटल भुगतान व्यवस्था के विस्तार का आधार तैयार हुआ।
किसी वृद्ध पेंशनर को भुगतान के लिए लंबी कतार में खड़ा न होना पड़े या किसी छात्र को छात्रवृत्ति के लिए कार्यालयों के चक्कर न लगाने पड़ें, यह बदलाव केवल तकनीकी सुधार नहीं है। यह नागरिक और राज्य के बीच संबंधों में परिवर्तन का भी संकेत है।
निगरानी और जवाबदेही बनी शासन की महत्वपूर्ण कड़ी
अच्छी योजनाओं के बावजूद उनका प्रभाव सीमित रह सकता है, यदि जमीन पर उनके क्रियान्वयन की निगरानी न हो। प्रधानमंत्री की शासन-पद्धति में निगरानी को विशेष महत्व दिया गया है।
प्रगति जैसे मंचों के माध्यम से केंद्र और राज्यों के अधिकारियों के साथ महत्वपूर्ण परियोजनाओं तथा शिकायतों की समीक्षा की गई। वहीं आकांक्षी जिला कार्यक्रम के माध्यम से पिछड़े जिलों को स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि, वित्तीय समावेशन और बुनियादी ढांचे जैसे संकेतकों पर लगातार आंका गया।
इसी तरह स्वच्छ सर्वेक्षण ने शहरों के बीच प्रतिस्पर्धा की भावना को बढ़ावा दिया। जल जीवन मिशन में नल कनेक्शन की प्रगति और पीएम गति शक्ति के माध्यम से बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के समन्वय पर जोर दिया गया।
इस पूरी व्यवस्था का उद्देश्य प्रशासन में निगरानी और जवाबदेही को नियमित प्रक्रिया का हिस्सा बनाना रहा है।
जनभागीदारी को शासन से जोड़ने की कोशिश
राष्ट्र निर्माण केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं है। नागरिकों की भागीदारी भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। स्वच्छ भारत अभियान में सफाई को केवल सरकारी जिम्मेदारी न मानकर जनभागीदारी से जोड़ने की कोशिश की गई।
इसी तरह ‘गिव इट अप’ अभियान में सक्षम लोगों से रसोई गैस सब्सिडी छोड़ने की अपील की गई। यह शासन और नागरिक के बीच जिम्मेदारी के नए संबंध की दिशा में एक प्रयोग के रूप में देखा जा सकता है।
दीर्घकालीन आर्थिक सुधारों पर जोर
कई ऐसे आर्थिक और प्रशासनिक सुधार भी किए गए, जिनका असर तत्काल नहीं बल्कि लंबे समय में दिखाई देता है। वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) ने देश को साझा बाजार की दिशा में आगे बढ़ाया। दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता ने वित्तीय अनुशासन को मजबूत करने का प्रयास किया।
सार्वजनिक पूंजीगत व्यय बढ़ाकर सड़क, रेलवे और बंदरगाह जैसे बुनियादी ढांचे में निवेश को गति दी गई। ऐसे सुधारों का प्रभाव आने वाले वर्षों में देश की आर्थिक क्षमता पर पड़ता है।
वैश्विक स्तर पर बढ़ी भारत की भूमिका
प्रधानमंत्री मोदी के शासनकाल में भारत की विदेश नीति और वैश्विक भूमिका को भी व्यापक रूप मिला है। जी-20 की अध्यक्षता के दौरान वैश्विक दक्षिण की आवाज को प्रमुखता देना, संकट के समय विदेशों में फंसे भारतीय नागरिकों की सुरक्षित निकासी और भारत की डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रस्तुत करना इस दिशा के महत्वपूर्ण उदाहरण हैं।
राष्ट्रीय सुरक्षा, सीमाओं की सुरक्षा और रक्षा क्षमता से जुड़े विषय भी अब व्यापक राष्ट्रीय आत्मविश्वास के विमर्श का हिस्सा बन चुके हैं।
आंकड़ों में दिखता बदलाव
पच्चीस वर्षों की इस यात्रा को आंकड़ों के माध्यम से भी देखने का प्रयास किया गया है। उपलब्ध सरकारी आंकड़ों और दावों के अनुसार भारत का कुल निर्यात 2013-14 के लगभग 466 अरब डॉलर से बढ़कर 2024-25 में करीब 825 अरब डॉलर हुआ। इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि हुई और रक्षा निर्यात में भी बड़ा विस्तार दर्ज किया गया।
राष्ट्रीय राजमार्ग निर्माण, डिजिटल भुगतान, विनिर्माण और बुनियादी ढांचे में निवेश जैसे क्षेत्रों में भी पिछले दशक के दौरान महत्वपूर्ण विस्तार देखने को मिला है। सरकार का दावा है कि करीब 25 करोड़ लोग गरीबी से बाहर आए हैं।
महिलाओं की श्रम भागीदारी में भी वृद्धि दर्ज की गई है। इन आंकड़ों का महत्व केवल संख्या में नहीं, बल्कि इस बात में है कि भारत की विकास यात्रा को अवसर, तकनीक, बुनियादी ढांचे, विनिर्माण और वैश्विक भूमिका से जोड़ने की कोशिश की गई है।
जनसेवा से राष्ट्रसेवा तक
उज्ज्वला से डिजिटल भुगतान तक, जनधन से जनभागीदारी तक और सड़क निर्माण से वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला तक विकास का दायरा लगातार विस्तृत हुआ है।
यही कारण है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 25 वर्ष पूरे होने का अवसर केवल उनके राजनीतिक सफर को पीछे मुड़कर देखने का अवसर नहीं है। यह उस शासन-पद्धति का मूल्यांकन करने का भी अवसर है, जिसने नागरिक सुविधाओं को राष्ट्रीय विकास की व्यापक दृष्टि से जोड़ने का प्रयास किया।
जननायक जनता की आकांक्षाओं को समझता है, जबकि राष्ट्रनायक उन आकांक्षाओं को राष्ट्रीय क्षमता में बदलने का प्रयास करता है। नरेंद्र मोदी के 25 वर्षों के शासन प्रमुख के रूप में सफर को इसी कसौटी पर देखें तो यह केवल एक राजनीतिक जीवन की कहानी नहीं, बल्कि शासन की बदलती शैली और भारत की बढ़ती राष्ट्रीय क्षमता की कहानी भी है।
आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शासन प्रमुख के रूप में 25 वर्ष पूरे कर रहे हैं। जनसेवा से राष्ट्रसेवा तक की यह यात्रा अभी जारी है।
लेखक: प्रेम शंकर झा, आईआरएसएस
बहुचर्चित पुस्तक ‘माडिफाइड गवर्नेंस’ के लेखक

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