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अपने तारणहार की प्रतीक्षा में है भगीरथ की गंगा…

यूनिवर्सिटी आफ शिकागो के एनर्जी पॉलिसी इंस्टीट्यूट के शोध में खुलासा हुआ है कि गंगा के किनारे लगते मैदानी इलाकों में प्रदूषण का स्तर लगातार बढ़ते जाने से लोगों की उम्र सात साल कम हो गयी है

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पतित पावनी, मोक्षदायिनी और जीवनदायिनी गंगा आज भी मैली है और अपने तारणहार की प्रतीक्षा में है कि कब कोई भगीरथ आयेगा और उसे जानलेवा प्रदूषण से मुक्ति दिलायेगा। असलियत यह है कि गंगा का जल अब पुण्य का नहीं वरन् मौत का सबब बन गया है। यदि 1986 से गंगा की सफाई पर सरकार द्वारा किये गये खर्च को छोड़ भी दिया जाये तो देश में 2014 में मोदी जी के सत्तारूढ़ होने के बाद से केंद्र ने 32,914,40 करोड़ रुपये के बजट के साथ 409 परियोजनाएं शुरू की हैं, सरकार ने नेशनल मिशन फॉर क्लीन रिवर गंगा को 2014-15 से 31 जनवरी 2023 तक 14084.72 करोड़ की राशि रिलीज की है, 31 दिसम्बर 2022 तक 32,912,40 करोड़ की लागत से 409 प्रोजेक्ट पर काम शुरू किया जा चुका है। इनमें 232 प्रोजेक्ट पूरे हो चुके हैं और 2026 तक के लिए केन्द्र सरकार ने 22,500 करोड़ की राशि की स्वीकृति भी दे दी है। यह जानकारी केन्द्रीय जल संसाधन राज्य मंत्री विश्वेश्वर टुडू संसद में दे चुके हैं। उसके बावजूद गंगा नदी की सफाई का मुद्दा इतने सालों बाद आज भी अनसुलझा है और गंगा अपने तारणहार की बाट जोह रही है। सबसे दुखदायी बात तो यह है कि गंगा के पूरे बहाव क्षेत्र के 71 फीसदी इलाके में कोलीफार्म की मात्रा खतरनाक स्तर पर पायी गयी है। यह हालात की भयावहता का सबूत है। इसकी पुष्टि तो केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड भी कर चुका है। जहां तक नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल का सवाल है, उसके मुताबिक भी गंगा के 60 फीसदी हिस्से में बिना किसी ट्रीटमेंट के सीधे गंदगी बहायी जा रही है। इसका परिणाम यह है कि गंगा का जल पीना तो दूर, वह अब आचमन लायक भी नहीं रह गया है।
मौजूदा हालात में गंगा जल को देश में चार जगहों यथा ऋषिकेश (उत्तराखण्ड), मनिहारी व कटिहार (बिहार), साहेबगंज व राजमहल (झारखंड) में ग्रीन कैटेगरी में रखा गया है। गौरतलब है कि ग्रीन कैटेगरी का मतलब यह है कि वहां का पानी कीटाणुओं को छानकर पीने में इस्तेमाल किया जा सकता है। जबकि उत्तर प्रदेश में तो कई एक यानी 25 जगहों से ज्यादा का पानी ग्रीन कैटेगरी में शामिल है ही नहीं। इन जगहों पर गंगा जल को हाई लेवल पर साफ करने के बाद ही पीने योग्य बनाया जा सकता है। 28 जगहों का पानी तो नहाने लायक ही नहीं है। उत्तर प्रदेश की सात जगहों यानी कानपुर में जाजमऊ, कानपुर डाउन स्ट्रीम, मिर्जापुर डाउन स्ट्रीम, चुनार, मालवीय पुल पर वाराणसी डाउन  स्ट्रीम, गोमती नदी गुमौला और गाजीपुर में लारीघाट इसमें प्रमुख रूप में शामिल हैं। इसका सबसे ज्यादा और अहम कारण सॉलिड और लिक्विड वेस्ट है जो सीधे सीधे गंगा में गिराया जा रहा है।
यूनिवर्सिटी आफ शिकागो के एनर्जी पॉलिसी इंस्टीट्यूट के शोध में खुलासा हुआ है कि गंगा के किनारे लगते मैदानी इलाकों में प्रदूषण का स्तर लगातार बढ़ते जाने से लोगों की उम्र सात साल कम हो गयी है। 1990 से लेकर 2016 तक के बीच के दौरान में उत्तर प्रदेश, बिहार, पंजाब, पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में प्रदूषण का स्तर 72 फीसदी बढ़ा है। और तो और अब तो यह भी साबित हो चुका है कि गंगा के पानी में घुले एंटीबायोटिक जानलेवा साबित हो रहे हैं। यूनिवर्सिटी ऑफ यार्क के वैज्ञानिकों के शोध के निष्कर्षों के मुताबिक संयुक्त राष्ट्र ने एंटीबायोटिक की प्रतिरोधक क्षमता समाप्त होने को वर्तमान में  स्वास्थ्य सम्बंधी समस्याओं में सबसे बडी़ समस्या माना है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार बैक्टीरिया या वायरस पर एंटीबायोटिक के बेअसर होने के कारण दुनिया में हर साल सात लाख मौतें होती हैं। 2030 तक यह आंकड़ा बढ़कर 10 लाख को पार कर जायेगा। विडम्बना यह है कि हमारे यहां गंगा से जुड़ी बहुतेरी सरकारी संस्थाएं इस तथ्य को नजरअंदाज करती आ रही हैं। असलियत में गंगा के पानी के साथ सबसे बड़ी समस्या यह है कि धार्मिक भावना के वशीभूत होकर इसमें बहुत बड़ी तादाद में लोग नहाते हैं। यही नहीं उसके जल का आचमन भी करते हैं। इससे गंगाजल के सीधे मुंह में जाने से एंटीबायोटिक प्रतिरोधी बैक्टीरिया सीधे शरीर में प्रवेश कर जाता है और शरीर पर अपना असर दिखाने लगता है। यहां इस तथ्य को जान लेना जरूरी है कि गोमुख से लेकर गंगासागर में मिलने तक गंगा कुल 2525 किलोमीटर का रास्ता तय करती है। गंगा के इस सफर में कुल 445 किलोमीटर हिस्सा बिहार में पड़ता है। यहां 730 मिलियन लीटर सीवर का पानी बिना शोधन के सीधे गंगा में गिराया जा रहा है। यहां गंगा में हानिकारक कीटाणुओं की तादाद इतनी खतरनाक स्तर पर पहुंच चुकी है जिससे चर्म रोग होने के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। यहां टोटल कोलीफार्म और फीकल कोलीफार्म का स्तर औसत से कई गुना ज्यादा है।
गंगा देश की संस्कृति और आस्था की पहचान है। लेक2न अब गंगा देशवासियों के स्वास्थ्य के लिए सुरक्षित नहीं रह गयी है। अब इसके जल के पान की बात तो दीगर है, इसमें स्नान भी सेहत के लिए खतरनाक साबित हो रहा है। क्योंकि अधिकांश जगहों पर कोलीफार्म बैक्टीरिया की मात्रा मानकों से 45 गुणा अधिक पायी गयी है। गंगा के प्रदूषित जल में जानलेवा बीमारियां पैदा करने वाले ऐसे जीवाणु मौजूद हैं जिनपर अब एंटीबायोटिक दवाओं का असर नहीं होता। हालिया अध्ययन इसके प्रमाण हैं कि जिन्होंने गंगा नदी बेसिन में माइक्रोप्लास्टिक के उच्च प्रसार का खुलासा किया है। चूंकि माइक्रोप्लास्टिक बायो डिग्रेबल नहीं होता। वह पर्यावरण में जमा होता रहता है। ये समुद्री, पारिस्थितिक तंत्र और मीठे पानी के तंत्र को प्रदूषित करते रहते हैं और कई सरी सृप, मीन और पक्षी प्रजातियों के लिए भीषण खतरा हैं। इनकी गंगा में मौजूदगी मानव स्वास्थ्य ही नहीं प्राणीमात्र के लिए भीषण खतरा है। इस सच्चाई को झुठलाया नहीं जा सकता।
बीते माह ही एनजीटी ने गंगा में प्रदूषण सम्बंधी एक याचिका की सुनवाई के दौरान गंगा में प्रदूषण की मौजूदा स्थिति जानने हेतु एक समिति के गठन को मंजूरी दी है ताकि इस संबंध में सही तथ्यात्मक स्थिति की जानकारी हो सके और तात्कालिक रूप से उपचारात्मक कार्रवाई हो सके। एनजीटी अध्यक्ष न्यायमूर्ति श्री प्रकाश श्रीवास्तव की पीठ ने इस बारे में कहा कि यह याचिका पर्यावरण मानदण्डों के अनुपालन  से सम्बंधित एक अहम मुद्दा उठाती है। यह समिति सही तथ्यात्मक स्थिति और आरोपों की सत्यता का पता लगायेगी। यहां यह जान लेना जरूरी है कि गंगा शुद्धि के अभियान में केन्द्र सरकार के सात मंत्रालयों की साख दांव पर है, वह पूरी जी जान से गंगा की सफाई अभियान में लगे हैं। फिर सवाल उठता है कि इसके बावजूद गंगा मैली क्यों है? हकीकत में गंगा तबतक साफ नहीं होगी जब तक स्थानीय निकाय ईमानदारी से अपनी भूमिका का निर्वहन न करने लग जायें और इस अभियान में जनभागीदारी की अहमियत समझते हुए उनका सहयोग लिया जाये। फिर सबसे अहम योगदान देश की धर्म प्राण जनता की जागरूकता का है। जब तक वह अपनी मां का महत्व नहीं समझेगी और गंगा को खुद ब खुद साफ रखने का संकल्प नहीं लेगी, तब तक गंगा की सफाई की ये सारी कबायदें बेमानी रहेंगी और गंगा साफ हो पाएगी, यह सपना सपना ही बना रहेगा। इसमें दो राय नहीं।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं पर्यावरणविद हैं।)
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