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नेप -2020 के सार्थक क्रियान्वयन में संस्कृत अध्यापकों का उत्तरदायित्व और बढ़ा- प्रो वरखेड़ी

संस्कृत भाषा भारत के अन्य भाषाओं के साथ मिल जुल कर भारतीय शिक्षा व्यवस्था के लिए ऊर्जागृह का कार्य करेगी।

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शिक्षक पर्व ‘कार्यक्रम के दूसरे दिन भी अभिमुखी तथा आभासी दोनों माध्यमों से महत्त्वपूर्ण व्याख्यान का आयोजन किया गया। इसमें केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, दिल्ली तथा राज्यों में स्थित इसके सभी परिसरों तथा आदर्श महाविद्यालयों की भी आभासी माध्यम से भागीदारी रही। केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय (CSU), दिल्ली के कुलपति प्रोफेसर श्रीनिवास वरखेड़ी जी की अध्यक्षता में यह कार्यक्रम संपन्न हुआ।
        गुरुवार के कार्यक्रम के सारस्वत अतिथि के रुप में कुमार भास्कर वर्मा संस्कृत एवं पुरातन अध्ययन विश्वविद्यालय, असम के कुलपति तथा शिक्षा शास्त्र के लब्धप्रतिष्ठ विद्वान प्रो प्रह्लाद आर्.जोशी ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति -2020 तथा इसमें संस्कृत शिक्षकों के योगदानों को लेकर अपना व्याख्यान दिया। प्रो जोशी ने  वर्तमान शिक्षा नीति में संस्कृत के संदर्भों को उल्लेख करते हुए शिक्षकों के महत्त्व तथा उनकी  गुणवत्ता पर प्रकाश डाला और यह भी स्पष्ट किया कि वर्तमान राष्ट्रीय शिक्षा नीति -2020 का कोठारी आयोग (1964) तथा नेशनल पौलिसी औफ़ एडुकेशन (एन पी ई- 1968) आदि से हट कर और क्या विशेषता है? उनका मानना था कि वर्तमान शिक्षा नीति में औन लाईन तथा प्रौढ शिक्षा (एडल्ट एडुकेशन) पर अधिक बल दिया गया, ताकि विद्यार्थी को अध्ययन अध्यापन तथा रोज़गार का अधिक से अधिक अवसर मिल सके। अध्यापकों को भी अधिक से अधिक शैक्षणिक संसाधनों तथा प्रशिक्षणों आदि दिये जाने पर बल दिया गया है, ताकि बहुप्रतिभाशाली भावी शिक्षकों को तैयार किया जा सके। इस नीति में विद्या को व्यावहारिक  तरीके से सीखने पर अधिक बल दिया गया है। इससे प्राचीन काल की तरह ही आज के समाज में भी शिक्षकों के प्रति और सम्मान बढ़ सकेगा।
        कुलपति प्रो श्रीनिवास वरखेड़ी ने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा कि क्या संस्कृत एक भाषा है ? या शास्त्र ? या जीवन की सभी कलाएं इसमें सन्निहित है? संस्कृत भाषा तथा साहित्य को लेकर इस पर विचार करना आज एक युगीन मांग है। प्रो वरखेड़ी का विचार था कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति -2020 सर्व शिक्षा अभियान की जगह समग्र शिक्षा अभियान में मील का पत्थर साबित होगा क्योंकि संस्कृत भाषा में जीवन की सभी चिन्तन और कलाएं समुपस्थित हैं। अतः संस्कृत भाषा भारत के अन्य भाषाओं के साथ मिल जुल कर भारतीय शिक्षा व्यवस्था के लिए ऊर्जागृह का कार्य करेगी। अतः हमारे संस्कृत शिक्षकों का राष्ट्र के पुनर्निर्माण के लिए और अधिक उत्तरदायित्व बढ़ रहा है। इसके लिए केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के शिक्षकों को बढ-चढ कर आगे आना होगा। इस समग्र शिक्षा के पुनर्निर्माण में गुरुकुल शिक्षा व्यवस्था का भी बड़ा ही महत्त्वपूर्ण योगदान होगा।

        कार्यक्रम के अंत में केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, दिल्ली के अकादमिक स्टाफ के साथ कुलपति प्रो वरखेड़ी की ही अध्यक्षता में  ‘शिक्षकाणां गुणकीर्तनम्’  नामक खेल के माध्यम से विश्वविद्यालय में संस्कृत संभाषण तथा आपस में सौमनस्य का वातावरण निर्माण के लिए एक नये तरीके के संस्कृत क्रीडा़ का भी आयोजन किया जिसमें एक शिक्षक एट रैडम किसी एक शिक्षक के नाम का पर्चा उठा कर उसके विषय में अपना अनुभव संस्कृत भाषा में साझा किया गया।

        कार्यक्रम का संचालन डा विश्वजीत् प्रणाणिक तथा धन्यवाद ज्ञापन डा मधुकेश्वर भट्ट ने किया। इस कार्यक्रम के संयोजक तथा सह संयोजक डा अमृता कौर तथा श्रीमती स्नेहलता उपाध्याय ने किया।
अतिथि का स्वागत प्रो पवन कुमार ने किया। यह कार्यक्रम कुलसचिव प्रो रणजित कुमार बर्मन जी के सानिध्य में संपन्ना हुआ।
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