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साहित्य अकादेमी द्वारा आज प्रख्यात कन्नड़ लेखक एस.एल. भैरप्पा की स्मृति में एक श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया गया। इस अवसर पर विभिन्न भारतीय भाषाओं के लेखकों ने उन्हें याद करते हुए अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की।
कार्यक्रम की शुरुआत में साहित्य अकादेमी के सचिव के. श्रीनिवासराव ने उन्हें इतिहास और नैतिकता के सबसे बड़े लेखक के रूप में याद किया। उन्होंने कहा कि भैरप्पा केवल एक महान लेखक ही नहीं, बल्कि एक गंभीर दार्शनिक भी थे, जिन्होंने अपने लेखन में सत्य को सर्वोपरि रखा।
कन्नड़ लेखक बसवराज सदर ने 1979 में उनसे हुई पहली मुलाकात को याद करते हुए बताया कि जब उन्होंने भैरप्पा से पूछा कि वे सत्य या सौंदर्य में किसे चुनेंगे, तो उनका जवाब था — “सत्य, क्योंकि सौंदर्य सत्य पर ही आधारित होता है।” उन्होंने कहा कि भैरप्पा ने अपने संघर्षपूर्ण जीवन में 25 से अधिक उत्कृष्ट उपन्यासों की रचना की, जो सदैव प्रेरणा देते रहेंगे।
तेलुगु लेखिका मृणालिनी सी. ने कहा कि भैरप्पा मास्टर स्टोरी टेलर थे, जिन्होंने अपने उपन्यासों में वैदिक भारत के दर्शन को जीवंत किया। उनके सभी उपन्यास गहन शोध पर आधारित थे और वे हर पाठक से संवाद स्थापित करते थे। वे किसी भी आंदोलन से प्रभावित नहीं हुए और अपना लेखन केवल इतिहास और सत्य पर केंद्रित रखा।
हिंदी लेखक राजकुमार गौतम ने कहा कि भैरप्पा के लेखन में मानव स्वभाव की सूक्ष्मतम भावनाओं को भी गहराई से चित्रित किया गया। वे जिस विषय पर लिखते, पहले उसका गहन अध्ययन करते थे। उनके लेखन में भारत की आत्मा स्वाभाविक रूप से झलकती है।
ओड़िया लेखक गौरहरि दास ने कहा कि उन्होंने मिथकीय पात्रों के माध्यम से एक नए भारतीय संसार की सृष्टि की। वहीं, गुजराती लेखक भाग्येश झा ने कहा कि भैरप्पा ने जादुई यथार्थवाद के युग में भारतीय वैदिक साहित्य को नई विश्वसनीयता दी — उन्हें “शब्दऋषि” कहना उचित होगा।
राजस्थानी लेखक अर्जुनदेव चारण ने कहा कि भैरप्पा ने वैदिक साहित्य को आधुनिक सामाजिक संदर्भों में प्रस्तुत किया और इतिहास को जीकर लिखा। हिंदी लेखक बलराम ने उनके उपन्यासों को सच्चे अर्थों में भारतीय उपन्यास बताया।
कन्नड़ लेखक मनु बलिगा ने अपने तीस वर्ष पुराने संबंधों को याद करते हुए कहा कि भैरप्पा का लेखन और जीवन एक समान था — सरल, सत्यनिष्ठ और समाजोन्मुख। उन्होंने जीवनभर साधारणता बनाए रखी और गरीब बच्चों के लिए कार्य किया।
अंत में साहित्य अकादेमी के अध्यक्ष माधव कौशिक ने कहा कि भैरप्पा ने अपने लेखन के माध्यम से धर्म और साहित्य के बीच के अंतर को स्पष्ट किया। उनके शोध केवल ऐतिहासिक नहीं बल्कि जीवन-दर्शन से भी जुड़े थे। उन्हें “भारतीय शैली के असली प्रतीक” के रूप में सदैव याद किया जाएगा।

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