International Women’s Day: साहित्य अकादेमी में ‘लोक साहित्य में नारी चित्रण’ विषय पर परिसंवाद आयोजित
लोक साहित्य में नारी की शक्ति पर चर्चा, मौली कौशल बोलीं— शिव को शक्ति पार्वती से मिलती है

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अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर साहित्य अकादेमी ने ‘लोक साहित्य में नारी चित्रण’ विषय पर एकदिवसीय परिसंवाद का आयोजन किया। जिसमें देश के विभिन्न हिस्सों के लोक साहित्यकारों और विशेषज्ञों ने भाग लिया।
कार्यक्रम की शुरुआत में साहित्य अकादेमी की कार्यक्रम अधिकारी मृगनयनी गुप्ता ने स्वागत वक्तव्य देते हुए कहा कि लोक साहित्य केवल रचनात्मक अभिव्यक्ति नहीं बल्कि किसी समुदाय की भावनात्मक आत्मकथा होता है। लोकगीतों, कथाओं, कहावतों और परंपराओं में नारी के अनेक रूप—माता, बेटी, प्रेमिका, श्रमिक, देवी और विद्रोही—स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं।
इस अवसर पर प्रख्यात लोक साहित्य विशेषज्ञ मौली कौशल ऑनलाइन माध्यम से जुड़ीं और बीज वक्तव्य दिया। उन्होंने महिला शक्ति पर जोर देते हुए शिव-पार्वती के समन्वय की कथा के विभिन्न रूपों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि शिव अपनी सभी शक्तियाँ पार्वती से प्राप्त करते हैं, क्योंकि पार्वती ही शक्ति का स्वरूप हैं।
परिसंवाद के पहले सत्र में लोक साहित्यकार प्रीति आर्या ने कुमाऊंनी लोकसाहित्य पर अपने विचार रखते हुए कहा कि लोकसाहित्य आदिम परंपराओं से जुड़ा है, जिसमें स्त्री-पुरुष का कोई भेद नहीं है। उन्होंने बताया कि कुमाऊंनी क्षेत्र में शिल्पकार वर्ग लोकसाहित्य के प्रमुख रचनाकार रहे हैं और वहाँ की स्त्री सदैव सशक्त रही है।
लोक साहित्यकार एस्थर सैमुअल ने अंडमान की लोक परंपराओं और वहाँ के स्त्री जीवन पर प्रकाश डाला, जबकि स्वाति आनंद ने छत्तीसगढ़ के लोकसाहित्य में नारी की भूमिका पर अपने विचार प्रस्तुत किए।
इस सत्र की अध्यक्षता सुगंधा नागर त्रिवेदी ने की। उन्होंने वक्ताओं के विचारों का सार प्रस्तुत करते हुए गुर्जर समाज के लोकगीतों पर आधारित अपना वक्तव्य दिया और अपनी पुस्तक ‘गुर्जरी लोकगीत’ का उल्लेख किया, जिसमें दिल्ली, हरियाणा और राजस्थान की गुर्जर महिलाओं से जुड़े लोकगीतों का संकलन है। उन्होंने यह भी बताया कि आशादेवी गुर्जरी पहली गुर्जर महिला थीं जिन्हें स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान 11 अन्य महिलाओं के साथ फाँसी की सज़ा सुनाई गई थी। सत्र के अंत में अमा काची मराक ने गारो लोकगीत प्रस्तुत किया।
दूसरे सत्र में जोराम आनिया ताना ने निशिं जनजाति के लोकसाहित्य पर चर्चा करते हुए बताया कि अरुणाचल प्रदेश की विभिन्न जनजातियों का मूल एक ही है। उन्होंने जीत तानी और अबो तानी की लोककथा का भी उल्लेख किया।
माहेश्वरी वीरसिंग गावित ने आदिवासी लोकसाहित्य में महिलाओं के स्थान पर प्रकाश डालते हुए कहा कि आदिवासी समाज में स्त्री को प्रकृति से सबसे अधिक जुड़ा हुआ माना जाता है। उन्होंने भील और वर्ली जनजातियों की परंपराओं और लोकगीतों में स्त्री की महत्वपूर्ण भूमिका का उल्लेख किया।
इस सत्र की अध्यक्षता वंदना टेटे ने की। उन्होंने कहा कि लोकसाहित्य को वह ‘पुरखा साहित्य’ कहना पसंद करती हैं क्योंकि इसमें विभाजन नहीं बल्कि अपनापन दिखाई देता है। उन्होंने कहा कि यह साहित्य हमारे इतिहास का आईना है और स्त्री के बिना सृजन संभव नहीं है। अपने संबोधन के अंत में उन्होंने खड़िया भाषा में एक गीत प्रस्तुत किया जिसमें पिता अपनी पुत्री से कहते हैं कि विवाह के बाद भी यह घर उसका ही रहेगा।
तीसरे सत्र की शुरुआत में एस्थर सैमुअल ने निकोबारी लोकगीत प्रस्तुत किया जिसमें निकोबार की प्राकृतिक सुंदरता का वर्णन किया गया। इसके बाद गारो लोक साहित्यकार बार्बरा ने गारो स्त्रियों की परंपराओं और उनकी सशक्तता पर प्रकाश डाला तथा कई लोककथाओं का उल्लेख किया।
बेनी सुमेर यांथन ने नागालैंड के आदिवासी लोकसाहित्य के इतिहास पर चर्चा करते हुए कहा कि नागा लोकगीतों में महिलाओं का महत्वपूर्ण योगदान है।
इस सत्र की अध्यक्षता गीता ने की। उन्होंने अपने संबोधन में बंजारा लोकसाहित्य में स्त्री स्वर और लोक परंपराओं पर विचार रखते हुए बंजारा महिलाओं के परिधान और परंपराओं का उल्लेख किया तथा गौड़ बंजारा और लंबानी जनजातियों की सांस्कृतिक परंपराओं पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि बंजारा लोकगीतों में माँ की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है।
कार्यक्रम के अंत में साहित्य अकादेमी की सहायक संपादक लक्ष्मी कुमारी भगत ने धन्यवाद ज्ञापन दिया। कार्यक्रम का संचालन साहित्य अकादेमी की कार्यक्रम अधिकारी मृगनयनी गुप्ता ने किया।

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