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गांधी : एक विलक्षण पर्यावरणविद- प्रशांत सिन्हा

गांधी जी ने पृथ्वी को एक जीवित जीव माना।

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2 अक्टूबर को भारत में राष्ट्र पिता महात्मा गांधी का जन्म दिवस ” गांधी जयंती “ के रूप में मनाया जाता है। महात्मा गांधी द्वारा अहिंसा आंदोलन चलाए जाने के कारण विश्व स्तर पर उनके प्रति सम्मान व्यक्त करते हुए इस दिन को विश्व अहिंसा दिवस (world non-violence day) के रूप में भी मनाया जाता है। गांधी के चिंतन का क्षेत्र बहुत व्यापक एवं बहुआयामी है। गांधी मात्र राजनीतिक कार्यकर्ता, आंदोलनकारी वकील ही नही थे, बल्कि वह एक समाज सुधारक एवं पर्यावरणविद् भी थे। किंतु गांधी आधुनिक अर्थों में पर्यावरणविद् नहीं थे क्योंकि आज हम एक ऐसी दुनिया में रहते हैं जिसमे विज्ञान, प्रौद्योगिकी और विकास मानव नियति को बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।  विकास के उद्देश्य के लिए प्राकृतिक संसाधनों के अत्याधिक दोहन से गंभीर पर्यावरणीय खतरे पैदा होते हैं। यह सर्वविदित है। वास्तव में वर्तमान स्थिति में विकास का विचार ही विवादास्पद है क्योंकि विकास के नाम पर हम प्राकृतिक संसाधनों को अनैतिक रूप से लूट रहे हैं। यह सच है कि एक विज्ञान जो प्रकृति की जरूरतों का सम्मान नही करता है और जो विकास लोगों की जरूरतों का सम्मान नही करता है , वह मानव अस्तित्व के लिए खतरा है। इसमें किंचित भी संदेह नहीं है कि गांधी के विचार हमें लोगों की जरूरतों के साथ प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाने के लिए एक नई दृष्टि देते हैं।
     आज से करीब सौ वर्ष पहले गांधी ने पश्चिमी समाज की जीवन शैली को देखते हुए धरती के लिए खतरा माना था। उनका कहना था कि पृथ्वी सभी व्यक्तियों की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए पर्याप्त है किंतु लालच की पूर्ति के लिए नही। पर्यावरण से संबंधित उनका यह वक्त्तव्य हमें बताता है कि कैसे उन्होंने उस समय पर्यावरणीय समस्याओं का अनुमान लगा लिया था जबकि उनके जीवनकाल में पर्यावरण प्रदूषण का घनत्व और प्राकृतिक संसाधनों का ह्रास की स्थिति इतनी गंभीर नहीं थी जितना आज है। पर्यावरण की समस्या औद्यौगिक क्रान्ति के कुछ वर्षों के बाद शुरु हुयी। औद्योगिक क्रान्ति का सबसे ज्यादा प्रभाव अमेरिका, इंग्लैंड, फ्रांस और दूसरे यूरोप के देशों पर पड़ा जहां जरूरतों को बढ़ाने और उपभोक्तावाद पर अत्याधिक बल दिया गया। इसके कारण इन देशों ने जमकर प्रकृति का दोहन किया। गांधी जी ने जरूरतों को कई गुणा बढ़ाने की अंधी दौड़ लगाने वालों देशों को अगाह किया था। अगर हम वर्तमान में जलवायु परिवर्तन, वैश्विक तापमान, प्रदूषण पर गौर करें और जिस प्रकार पश्चिमी देश ही नहीं समूची दुनिया कार्बन उत्सर्जन कम करने के लिए चिंतित है उससे गांधी जी सौ साल पहले का कथन आज प्रासंगिक लगता है। असलियत में गांधी जी सबकी समृद्धि चाहते थे। उन्होंने भौतिक साधन को प्रतिष्ठा का प्रतीक न बना कर आत्म संयम को ही प्रतिष्ठा का प्रतीक बताया था। उन्होंने उपभोक्तावाद के विरोध में रूढ़िवाद की वकालत और जीवन शैली की सादगी पर जोर दिया। गांधी जी ने कुटीर उद्योगों को प्रोत्साहित किया क्योंकि वे गतिविधियाँ प्राकृतिक जैव संसाधनों पर आधारित है और पर्यावरण के अनुकूल होने के साथ साथ गैर प्रदूषणकारी भी है। उनका ” रूढ़िवाद ” का सिद्धांत न कि ” उपभोक्तावाद ” की हमें याद दिलाता है कि मनुष्य अपने असीमित लालच को संतुष्ट करने के लिए प्रकृति का असीम दोहन  नहीं कर सकता है। अमेरिका के ” द टाइम मैनेजमेंट ” ने अपने 9 अप्रैल 2007 के अंक में दुनिया को वैश्विक तापमान से बचाने के 51 उपाय बताये थे। इनमें से 51वाँ उपाय था कम उपभोग, ज्यादा साझेदारी और सरल जीवन।
     गांधी जी ने पृथ्वी को एक जीवित जीव माना। उनके विचार दो मौलिक कानूनों के संदर्भ में व्यक्त किए गए थे : ब्रह्मांडीय कानून और प्रजातियों का कानून। ब्रह्मांडीय कानून पूरे ब्रह्मांड को एक इकाई के रूप में देखता है। भव्य प्रणाली में निर्मित सीमा के बाहर कुछ भी खराब नहीं हो सकता है जिसमें जीवित और निर्जीव दोनों घटनाएं शामिल हैं। उनका मानना था कि ” ब्रह्मांड को ब्रह्मांडीय आत्मा द्वारा संरचित और सूचित किया गया था कि सभी मानव, सभी जीवन और वास्तव में सभी सृजन एक थे।
     गांधी जी के विचारों से पर्यावरण  का सामना करने का उपाय दिखता है। चूंकि पर्यावरण राजनीतिक चिंतन में एक नई अवधारणा के रूप में उभरा है, वर्तमान में पर्यावरण राजनीति विज्ञान में एक बहुआयामी, लोक कल्याणकारी, मानवाधिकारों से जुड़ी संकल्पना बन गई है। 1987 में ब्रुडलैंड कमीशन रिपोर्ट के बहुत पहले ही महात्मा गांधी ने लगातार बढ़ती इच्छाओं की ओर ध्यान दिलाया था। अपनी पुस्तक ” हिंद स्वराज “ में उन्होंने लगातार हो रही खोजों को आने वाले समय के लिए खतरा बताया था। इसी पुस्तक में आधुनिक शहरी औद्यौगीकरण को विनाश का कारण बताया गया है। उन्होंने शुद्ध हवा और पानी पर भी बल दिया था। इस बात को उन्होंने अपने लेख ” टु हेल्थ “ में बताया था।। पानी की कमी के मुद्दे पर उन्होंने लोगों को सलाह दी थी कि सभी को एक संघ बना कर दीर्घकालिक उपाय करना चाहिए और खाली भूमि पर पेड़ लगाना चाहिए। यही नहीं उन्होंने वर्षा जल के संचयन पर जोर दिया था। ये सभी तथ्य बताते हैं कि पर्यावरण के लिए गांधी जी की सोच और विचार कितने महत्वपूर्ण है।
(लेखक सामाजिक कार्यकर्ता एवं पर्यावरण विषयक मामलों के जानकार हैं।)
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