राजभाषा पत्रिकाओं की प्रासंगिकता पर साहित्य अकादेमी में विचार-विमर्श
साहित्य अकादेमी की राजभाषा पत्रिका 'आलोक' के नवीन अंक का लोकार्पण, विशेषज्ञों ने साझा किए विचार

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साहित्य अकादेमी द्वारा आज राजभाषा मंच के अंतर्गत “राजभाषा पत्रिकाओं के महत्त्व और प्रासंगिकता” विषय पर एक विचारगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस अवसर पर देशभर के कई प्रतिष्ठित संस्थानों के हिंदी अधिकारी और साहित्यप्रेमी उपस्थित रहे।
कार्यक्रम के आरंभ में साहित्य अकादेमी की राजभाषा पत्रिका “आलोक” के नवीन अंक का लोकार्पण किया गया। इसके पश्चात आमंत्रित वक्ता जयप्रकाश कर्दम ने विषय पर अपना उद्बोधन देते हुए कहा कि राजभाषा पत्रिकाओं के माध्यम से हिंदी के प्रचार-प्रसार का वातावरण तैयार होता है, लेकिन इन पत्रिकाओं की प्रासंगिकता को बनाए रखना संपादकों की सबसे बड़ी चुनौती है। उन्होंने सुझाव दिया कि राजभाषा पत्रिकाओं को न केवल उपयोगी और रोचक बनाना होगा, बल्कि हिंदीतर भाषी लेखकों को भी अधिक मात्रा में जोड़ने का प्रयास करना चाहिए, जिससे हिंदी का दायरा और प्रभाव क्षेत्र बढ़े।

पूर्व संपादक रणजीत साहा ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि यद्यपि राजभाषा पत्रिकाओं में रचनात्मकता की कुछ सीमा हो सकती है, फिर भी वे हिंदी भाषा के व्यावहारिक विकास के कई सूत्र प्रदान करती हैं। उन्होंने कहा कि इन पत्रिकाओं के माध्यम से सरकारी क्षेत्रों में हिंदी के तकनीकी और प्रशासनिक प्रयोग की दिशा में सराहनीय काम हो रहा है।
इस परिचर्चा में राजेश कुमार एवं वरुण कुमार ने भी राजभाषा पत्रिकाओं से जुड़े अपने अनुभवों और सुझावों को साझा किया। उन्होंने इन पत्रिकाओं की सामग्री को समकालीन संदर्भों से जोड़ने की आवश्यकता पर बल दिया।
साहित्य अकादेमी के सचिव के. श्रीनिवासराव ने मुख्य अतिथि का स्वागत पारंपरिक अंगवस्त्र से करते हुए कहा कि इस प्रकार की संगोष्ठियाँ न केवल संवाद का माध्यम बनती हैं, बल्कि राजभाषा पत्रिकाओं की गुणवत्ता सुधारने में भी सहायक होती हैं। उन्होंने अन्य संस्थाओं के हिंदी अधिकारियों की उपस्थिति पर प्रसन्नता व्यक्त की।
कार्यक्रम का सफल संचालन एवं समापन पर औपचारिक धन्यवाद ज्ञापन अकादेमी के उपसचिव देवेंद्र कुमार देवेश ने किया।
इस आयोजन में भारतीय राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी, आकाशवाणी, दूरदर्शन, केंद्रीय हिंदी प्रशिक्षण संस्थान, कृषि खाद एवं जलसंसाधन योजना, वास्तुकला विद्यालय, नगर एवं ग्राम संयोजन संगठन, संसदीय कार्य मंत्रालय, राष्ट्रीय विज्ञान केंद्र, संगीत नाटक अकादेमी, वैमानिक गुणवत्ता आश्वासन महानिदेशालय, केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण, शिक्षा विभाग, इफको आदि संस्थाओं से अधिकारीगण शामिल हुए।
यह कार्यक्रम न केवल राजभाषा पत्रिकाओं की भूमिका को रेखांकित करता है, बल्कि इनके भविष्य की दिशा तय करने में भी महत्वपूर्ण साबित हुआ।
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