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ग़र्दिशे-दौरां के नाम
ये दौर है कुछ अजीबो-ग़रीब
ये दौर है कुछ पेंचीदा सा,
नाउम्मीदी का भी नाम नहीं
उम्मीदों के निशां भी मिटे नहीं,
हंसने को न जी करता है
न ज़ख़्म कहीं कोई दिखता है
हम जीते-जीते हैं थकने लगे
पर ज़िंदगी की तलाश में ही भटकने लगे
हम रोना भी नहीं चाहते हैं
पर मुस्कुराने की वजह मांगते हैं
अब आंसू भी नहीं आते हैं
पर लोगों को हम हंसाते हैं
ये बड़ा घना है अंधियारा
लगता है किसी ने है पुकारा
पर दूर तलक भी कोई नहीं
न आह, न आवाज़, कोई भी नहीं
कहने को कोई पराया नहीं
पर अपनों का भी साया नहीं
हम कहां से ढ़ूंढ़ें राह नई
भटके कदमों में है जान नहीं
अब हम भी रुकना चाहते हैं
अब हम भी चाहते ठहरना हैं
ख़ामोशी ओढ़कर सोने से पहले
बस इतना ही और था कहना
हम सहते-सहते चूक गए
अब और नहीं कुछ भी सहना…
@ दामिनी यादव
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