भोपाल में स्वतंत्र सिनेमा को बढ़ावा देने के लिए बने बेहतर मंच: फिल्मकार सुदीप सोहनी
क्लब लिटराटी के ‘सिने टॉक–द अनस्क्रिप्टेड फ्रेम’ में स्वतंत्र सिनेमा की चुनौतियों, डॉक्यूमेंट्री निर्माण और नए रचनात्मक प्रयोगों पर हुई चर्चा

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भोपाल, संवाददाता। भोपाल की समृद्ध कला-संस्कृति परंपरा में स्वतंत्र सिनेमा को भी पहचान और सम्मानजनक स्थान मिलना चाहिए। इसके लिए शहर में ऐसा सक्रिय मंच और सिनेमा समुदाय विकसित करने की जरूरत है, जहां नई फिल्मों, रचनात्मक प्रयोगों और आधुनिक तकनीकों को प्रोत्साहन मिले। यह बात फिल्मकार और लेखक सुदीप सोहनी ने शुक्रवार को क्लब लिटराटी की ओर से आयोजित ‘सिने टॉक–द अनस्क्रिप्टेड फ्रेम’ कार्यक्रम में कही।
आलियांस फ्रांसेस परिसर में आयोजित इस संवाद में सुदीप सोहनी ने अपनी सिनेमा यात्रा, स्वतंत्र फिल्मों के निर्माण में आने वाली चुनौतियों, बच्चों के सिनेमा, डॉक्यूमेंट्री निर्माण और अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों के अनुभव साझा किए। नृत्य गुरु डॉ. मंजू मणि हतवलने के साथ हुई बातचीत में भोपाल में स्वतंत्र सिनेमा के लिए बेहतर मंच तैयार करने और दर्शकों के साथ सीधा संवाद बढ़ाने की जरूरत पर विशेष जोर दिया गया।
भोपाल में स्वतंत्र सिनेमा के लिए बने सक्रिय समुदाय
सुदीप सोहनी ने कहा कि दुनियाभर में स्वतंत्र सिनेमा के क्षेत्र में नए प्रयोग हो रहे हैं और भारतीय क्षेत्रीय फिल्मों के प्रति दर्शकों की रुचि भी बढ़ रही है। ऐसे समय में भोपाल जैसे सांस्कृतिक शहर में स्वतंत्र फिल्मकारों को अपनी प्रतिभा दिखाने के अधिक अवसर मिलने चाहिए।
उन्होंने कहा कि शहर के सांस्कृतिक आयोजनों में रंगमंच, संगीत, साहित्य और चित्रकला की तरह स्वतंत्र सिनेमा को भी प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। इसके लिए ऐसा मंच विकसित किया जाए, जहां लोग फिल्में देख सकें, उन पर विचार-विमर्श कर सकें, फिल्म निर्माण की बारीकियां सीखें और नई तकनीकों के माध्यम से रचनात्मक प्रयोग कर सकें। इससे स्वतंत्र फिल्मों को व्यापक दर्शक वर्ग तक पहुंचाने में मदद मिलेगी।
जर्मनी में भारतीय फिल्मों को लेकर दिखा उत्साह
अपनी हालिया यूरोप यात्रा के अनुभव साझा करते हुए सोहनी ने बताया कि जर्मनी में उनकी फिल्म के प्रदर्शन के दौरान दर्शकों की उत्सुकता ने उन्हें प्रभावित किया। फिल्म देखने के बाद न्यूयॉर्क से आए एक फिल्म छात्र ने उनका विस्तृत साक्षात्कार किया। उन्होंने बताया कि भारतीय फिल्मों को देखने के लिए दर्शकों का सुबह से सिनेमाघरों में पहुंचना और प्रदर्शन के बाद फिल्मकारों से संवाद करने में रुचि दिखाना उनके लिए खास अनुभव रहा।
उन्होंने देहरादून में अपनी फिल्म ‘जग्गू और मागाहारी’ को मिली दर्शकों की प्रतिक्रिया का भी उल्लेख किया। उनके अनुसार, इस तरह के अनुभव बताते हैं कि स्वतंत्र फिल्मों के लिए दर्शकों के बीच रुचि और संवाद की पर्याप्त संभावनाएं मौजूद हैं।
तकनीक से अधिक महत्वपूर्ण विचार और ईमानदारी
डॉक्यूमेंट्री फिल्मों ‘तनिष्का’ और ‘यादों में गणगौर’ के निर्माण अनुभव साझा करते हुए सोहनी ने कहा कि फिल्म बनाने की प्रक्रिया में विचार की स्पष्टता और रचनात्मक ईमानदारी सबसे महत्वपूर्ण हैं। तकनीकी कमियां होने के बावजूद यदि फिल्मकार का प्रयास सच्चा है, तो उसकी बात दर्शकों तक पहुंच सकती है। रचनात्मकता में ईमानदारी का कोई विकल्प नहीं है।
डॉ. मंजू मणि हतवलने ने ‘तनिष्का’ के निर्माण से जुड़ी चुनौतियों का उल्लेख करते हुए बताया कि फिल्म की शूटिंग तीन वर्षों में आईफोन और बुनियादी उपकरणों की मदद से की गई। यह अनुभव बताता है कि सीमित संसाधन भी रचनात्मक अभिव्यक्ति के रास्ते में अनिवार्य रूप से बाधा नहीं बनते। दृढ़ संकल्प, स्पष्ट दृष्टि और विषय के प्रति समर्पण के साथ प्रभावशाली फिल्म बनाई जा सकती है।
भोपाल की कला परंपरा और सिनेमा का भविष्य
कार्यक्रम की शुरुआत वरिष्ठ कला समीक्षक विनय उपाध्याय ने ‘भोपाल और कलाओं के सरोकार’ विषय पर अपने विचार साझा करते हुए की। उन्होंने भोपाल की रंगमंच, संगीत, साहित्य और चित्रकला से जुड़ी समृद्ध परंपराओं का उल्लेख किया। साथ ही, शहर में सिनेमा के क्षेत्र में हो रहे प्रयासों और सुदीप सोहनी की कला यात्रा पर भी चर्चा की।
क्लब लिटराटी की अध्यक्ष और लेखिका डॉ. सीमा रायजादा ने अतिथियों का स्वागत करते हुए आयोजन के उद्देश्य पर प्रकाश डाला। कार्यक्रम का संचालन प्राची मजूमदार ने किया।
‘सिने टॉक–द अनस्क्रिप्टेड फ्रेम’ के माध्यम से स्वतंत्र सिनेमा के सामने मौजूद चुनौतियों, रचनात्मक संभावनाओं और भोपाल में इसके विकास के लिए जरूरी पहल पर सार्थक संवाद हुआ। कार्यक्रम में यह विचार प्रमुखता से उभरा कि स्वतंत्र सिनेमा को आगे बढ़ाने के लिए बेहतर मंच, दर्शकों की भागीदारी और नए प्रयोगों के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करना आवश्यक है।

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