भोपाल में बेटियों के हक की आवाज, कन्याभ्रूण हत्या पर भावुक मंचन
‘तुम फिर भी जीना लड़की’ नाटक के जरिए कन्याभ्रूण हत्या पर सशक्त प्रहार, डॉ वीणा सिन्हा की कविताओं का मंचन, सितार वादन और काव्य पाठ ने बांधा समां

👆भाषा ऊपर से चेंज करें
संवाददाता, भोपाल।
समाज में व्याप्त कन्याभ्रूण हत्या जैसी कुरीति और स्त्री संवेदनाओं को केंद्र में रखकर तैयार किए गए लघु नाटक ‘तुम फिर भी जीना लड़की’ का प्रभावशाली मंचन शुक्रवार को शिवाजी नगर स्थित दुष्यंत कुमार पांडुलिपि स्मारक संग्रहालय में किया गया। यह नाटक शासकीय चिकित्सा सेवा से सेवानिवृत्त साहित्यकार डॉ. वीणा सिन्हा की कविताओं पर आधारित था, जिसने दर्शकों को गहराई से झकझोर दिया।
कन्याभ्रूण हत्या पर करारा प्रहार
नाटक की मार्मिक पंक्तियां —
“माएं, दादियां और नानियां, जब तक कोख में बेटियां हैं और बेटियों से नफरत है मांओं को…”,
जब मंच से गुंजायमान हुईं तो सभागार में सन्नाटा छा गया। यह प्रस्तुति केवल एक नाट्य मंचन नहीं, बल्कि समाज की मानसिकता पर सीधा सवाल था।
‘तुम फिर भी जीना लड़की’ ने कन्या भ्रूण हत्या के सामाजिक, पारिवारिक और भावनात्मक आयामों को प्रभावी ढंग से उजागर किया। किरदारों ने डॉ. वीणा सिन्हा की कविताओं की पंक्तियों को जीवंत अभिनय के माध्यम से मंच पर साकार किया।
नन्हीं कलाकार लावण्या के सशक्त अभिनय को दर्शकों ने विशेष सराहना दी। स्वर रंग आर्ट एंड कल्चरल सोसाइटी द्वारा प्रस्तुत इस नाटक का निर्देशन राहुल शर्मा ‘राहुल्य’ ने किया। अंतर्राष्ट्रीय सितार वादिका स्मिता नागदेव के सजीव सितार वादन ने मंचन को और अधिक प्रभावशाली बना दिया।

मंच पर प्राची चौकसे, सौम्या श्रीवास, खुशी विजयवर्गीय एवं गीतांशी के अभिनय ने प्रस्तुति को भावनात्मक ऊंचाई प्रदान की।
पुस्तिका का विमोचन और काव्य पाठ ने बांधा समां
कार्यक्रम के दौरान वरिष्ठ साहित्यकार हरि भटनागर ने डॉ. वीणा सिन्हा की चयनित एवं संपादित कविताओं की पुस्तिका का विमोचन किया।
इस अवसर पर प्रख्यात कवि निरंजन श्रोत्रिय, राग तेलंग एवं सुश्री अपर्णा पात्रीकर ने महिला मुद्दों पर केंद्रित अपनी रचनाओं का काव्य पाठ किया, जिसने श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।
श्री राग तेलंग ने ‘दृश्य में स्त्री का प्रवेश’, ‘पाखी भी रोते हैं’ और ‘अंतरलय’ जैसी कविताओं के माध्यम से समाज और सभ्यता के निर्माण में स्त्री की बुनियादी भूमिका को रेखांकित किया।
युवा गजलकार अपर्णा पात्रीकर ने डॉ. सिन्हा की कविता ‘आग से निकलकर मां तैरेगी नदी की तलहटी में’ के साथ अपनी गजलें — “सवाली हूं मुझे बस एक झलक पाना जरूरी है” और “रगे जां में सांस की तरह बह कि लहू की तरह बदन में आ” — प्रस्तुत कर भावनात्मक वातावरण निर्मित किया।
वरिष्ठ कवि निरंजन श्रोत्रिय ने ‘जरूरत भी नहीं है’, ‘लेडीज़ रुमाल’, ‘द करवा चौथ’, ‘स्वप्न में समुद्र’, ‘औरत’ और ‘बिटिया’ जैसी कविताओं के पाठ के माध्यम से स्त्री के दैनंदिन जीवन और पारिवारिक संदर्भों पर संवेदनशील दृष्टिकोण प्रस्तुत किया।
कार्यक्रम का संचालन डॉ. विशाखा राजुरकर ने किया, जबकि स्वागत उद्बोधन करुणा राजुरकर ने दिया।
सामाजिक चेतना का सशक्त मंच
यह आयोजन केवल साहित्यिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना का सशक्त मंच साबित हुआ। ‘तुम फिर भी जीना लड़की’ ने एक बार फिर यह संदेश दिया कि समाज में बेटियों के अस्तित्व और सम्मान की रक्षा सामूहिक जिम्मेदारी है।

Stay Updated with Dainik India 24×7!
Follow us for real-time updates:




