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साहित्य अकादमी द्वारा आयोजित “स्वतंत्रता का दर्शन” विषय परिसंवाद

कार्यक्रम में भारी संख्या में लेखक, विद्वान, शोधार्थी और विभिन्न विश्वविद्यालयों के छात्र छात्राएं उपस्थित थे

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साहित्य अकादमी द्वारा स्वाधीनता दिवस एवं आजादी का अमृत महोत्सव के अवसर पर आज  स्वतंत्रता का दर्शन विषयक परिसंवाद आयोजित किया गया। परिसंवाद में अल्पना मिश्र, अनंत विजय ,पूरन चंद टंडन, चंदन कुमार चौबे, प्रताप सोमवंशी और  राजेश प्रताप सिंह ने अपने विचार व्यक्त किए। परिसंवाद की अध्यक्षता चंद्रभान खयाल ने की।
     इस अवसर पर राजेश प्रताप सिंह ने कहा कि स्वतंत्रता का मतलब स्वच्छंदता नहीं है यानी स्वतंत्रता अपने साथ कुछ कर्तव्य बोध भी लेकर आती है जिसका हमें परिपालन करना जरूरी है।
     वरिष्ठ पत्रकार अनंत विजय ने कहा कि स्वतंत्रता का जो पश्चिमी दर्शन है वह हमसे अलग है लेकिन काफी समय तक उसी के आधार पर उसको परिभाषित करने के कारण असमंजस की स्थिति बनी है। उन्होंने कहा हमारे दर्शन में तो देवता चुनने की भी स्वतंत्रता है। हमारे दर्शन में स्वतंत्रता जन्म से ही शुरू हो जाती है। हमारे लोक जीवन में ही नहीं स्वतंत्रता का दर्शन हमारे प्रकृति के लिए भी संकल्पित है।
     लेखिका अल्पना मिश्र ने कहा कि स्वस्थ समाज के लिए सकारात्मक स्वतंत्रता जरूरी है। उन्होंने विवेक और स्व नियंत्रण की बात भी की। उन्होंने भेदभाव की विसंगतियों से मुक्त  स्वाधीनता को सच्ची स्वतंत्रता कहा। उन्होंने साहित्य की भूमिका को भी रेखांकित किया।
     पत्रकार और संपादक प्रताप सोमवंशी ने कहा कि स्वतंत्रता का अर्थ सबके लिए अलग-अलग होता है। हमारे स्व की पहचान क्या है यह सबसे महत्वपूर्ण है। उन्होंने अदम गोंडवी के एक शेर का जिक्र करते हुए अपनी बात को और विस्तार दिया।
     प्रोफेसर चंदन कुमार चौबे ने कहा कि धर्म बोध एक ऐसा कारण है जिसके कारण हमारे देश की स्वतंत्रता हमेशा बची रही है। उन्होंने शिक्षा,साहित्य, संस्कृति और कला की स्वतंत्रता को चिन्हित करते हुए कहा कि स्वविवेक और स्वधर्म के बोध से ही हम संतुलन बनाए रख सकते हैं।
     प्रोफेसर पूरनचंद टंडन ने कहा कि स्वतंत्रता का रचनात्मक पक्ष सबसे महत्वपूर्ण पक्ष है और स्वतंत्रता समय सापेक्ष होती है और यह समय के संदर्भ में अपनी परिभाषाएं बदलती रहती है।आगे उन्होंने कहा कि हमारे यहां तो स्वतंत्रता को समीर कहा गया है जो कि हमें सुखद अनुभव देती है। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता विलक्षण और मूल्यवान धरोहर है जिसका हमें संरक्षण करना चाहिए।
     सत्र की अध्यक्षता कर रहे प्रख्यात शायर चंद्रभान खयाल ने कहा कि आजादी का तस्सवुर हमारे धर्म और संस्कृति में बहुत पहले से रहा है और समय-समय पर उसका रंग रूप बदलता रहा है। उन्होंने अट्ठारह सौ सत्तावन की लड़ाई को महत्वपूर्ण मानते हुए कहा कि हमारा स्वतंत्रता आंदोलन एक केंद्रीय लड़ाई थी जिसमें पूरे देश ने भाग लिया।
     कार्यक्रम के आरंभ में साहित्य अकादमी के सचिव ने सभी का स्वागत अंगवस्त्रम देकर किया और अपने स्वागत वक्तव्य में कहा कि  दर्शन का मूल कार्य उस प्रणाली को ढूंढना है जिससे हम उसको सरल रूप में परिभाषित कर सकें। स्वतंत्रता हमारे लिए प्रासंगिक रहे और उसके नए संदर्भ हमारे सामने आएँ इसलिए इस विषय का चुनाव किया गया। कार्यक्रम में भारी संख्या में लेखक, विद्वान, शोधार्थी और विभिन्न विश्वविद्यालयों के छात्र छात्राएं उपस्थित थे। कार्यक्रम का संचालन संपादक हिंदी अनुपम तिवारी ने किया।
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