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एक ट्रांसजैंडर की दास्तान है ‘ब्रीड’ -दीपक दुआ

इस फिल्म को देख कर लोगों के दिलों में हम जैसे लोगों के लिए सम्मान बढ़ेगा, वे हमारी भावनाओं को समझेंगे और हमें अपने बराबर मानेंगे --बॉबी कुमार

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वह हरियाणा के जींद जिले की रहने वाली हैं। उनका नाम है बॉबी कुमार और वह खुद को ‘गे सेलिब्रिटी’ कहती हैं। ‘जोधा अकबर’, ‘शबनम मौसी’, ‘अग्निपथ’ जैसी कई फिल्मों और टी.वी. के ढेरों रिएलिटी शोज में आने के बाद बॉबी अब बतौर निर्माता-निर्देशक अपनी पहली फिल्म ‘ब्रीड’ लेकर आई हैं। यह फिल्म फिलहाल अमेजन प्राइम वीडियो पर अमेरिका, यू.के. और जर्मनी में रिलीज हुई है और बहुत जल्द भारत में दो-एक ओ.टी.टी. मंचों पर आने वाली है। बॉबी कुमार (Bobby Kumar)से हुई बातचीत के अंश—-
-क्या है ‘ब्रीड’ और इसके जरिए आप क्या कहना चाहती हैं?
-यह फिल्म ‘ब्रीड’ यानी नस्ल की बात करती है। यह एक ऐसे इंसान की संघर्ष-यात्रा है जिसे समाज में हम किन्नर, हिजड़ा, गे, होमोसैक्सुअल या ऐसे ही नामों से पुकारते हैं, ताने देते हैं और अपने बराबर का नहीं समझते। लेकिन ऐसा व्यक्ति भी आखिर है तो इंसान ही। उसके व्यक्तिगत जीवन में क्या खालीपन है, उसकी क्या ख्वाहिशें हैं, इस बारे में समाज नहीं सोचता। यह एक ऐसे ही इंसान की कहानी है।
-इस विषय पर फिल्म बनाने का विचार कैसे आया?
-हमारे समाज में ऐसे बहुत सारे मुद्दे हैं जिन्हें हम लोग देख कर भी नहीं देखना चाहते। मुझ जैसे लोग जो एल.जी.बी.टी. समुदाय से हैं, जब हमारी बात होती है तो समाज अक्सर आंखें फेर लेता है। यह कहानी कहीं न कहीं मेरे अपने परिवार से, मेरी अपनी जिंदगी से निकली है। मुझे लेकर मेरे अपने परिवार में जो घटा है, वह मेरे मन में गहरे तक बैठा हुआ है और मैंने तय कर रखा था कि अगर कभी मैं किसी काबिल बन सकी तो दुनिया के सामने वह कहानी जरूर कहूंगी।
-अपने किरदार के बारे में बताएं?
-इस फिल्म में जो मेरा किरदार सकीना बानो का है जो मां बनना चाहती है, लेकिन बन नहीं सकती क्योंकि वह एक अपूर्ण नारी है। वह सब धर्मों से ऊपर इंसानियत के धर्म को मानती है। वह एक पुरुष से प्रेम करती है लेकिन ऊपर वाले ने उसे इस तरह का बनाया है कि उसकी इच्छाएं पूर्ण नहीं हो सकती। उसका जो दर्द है, उसे इस फिल्म में सामने लाया गया है।
-आपको लगता है कि लोग इस तरह की फिल्म देखना चाहेंगे?
-मुझे लगता है कि लोग हर वह चीज देखना चाहते हैं जो उन्हें कुछ हट कर दे पाए और उनके दिल को छू पाए। यह एक पूरी तरह से मनोरंजक फिल्म है लेकिन साथ ही पूरी तरह से साफ-सुथरी भी है। मुझे पूरा यकीन है कि इस फिल्म को देख कर लोगों के दिलों में हम जैसे लोगों के लिए सम्मान बढ़ेगा, वे हमारी भावनाओं को समझेंगे और हमें अपने बराबर मानेंगे।
-दीपक दुआ 
फिल्म समीक्षक, पत्रकार और यात्रा लेखक(Travel Writer) हैं। 
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