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बरगद की छाया है- पिता

यही एक रिश्ता है जिसमें अपने से अधिक कामयाब होता देखकर ईर्ष्या नहीं होती है। पिता को सम्मान देने के लिए ही Fathers day या पितृ दिवस हर साल मनाया जाता है। जबकि हमारी संस्कृति में तो हर दिन पितृ दिवस है।

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स्नेह, पालना और दुलार का खजाना पिता से ही मिलता है और बच्चों को यह निश्चित रहता है उसे हर चीज आसानी से मिल जाएगी, क्योंकि उसके पास पिता जैसा अनमोल रत्न हैः-
हमारे समाज में पिता की भूमिका सबसे अहम मानी जाती है। वह घर का मुखिया होता है। इसलिए उसके कंधे पर घर-परिवार की सारी जिम्मेदारी Responsibility होती हेै। मां घर की देखभाल करती है, तो पिता परिवार की परवरिश करते हैं। माता-पिता की जगह इस संसार में कोई नहीं ले सकता। पिता ही है जो अपने बच्चे को अंगूलि पकड़कर चलना सिखाते हैं, कंधे पर झूला झूलाते हैं और उसके रक्षक भी होते हैं। बच्चे को अपने से आगे बढ़ता हुआ देखकर उसे अपार खुशी होती है। यही एक रिश्ता है जिसमें अपने से अधिक कामयाब होता देखकर ईर्ष्या नहीं होती है। पिता को सम्मान देने के लिए ही फादर्स डे या पितृ दिवस हर साल मनाया जाता है। जबकि हमारी संस्कृति में तो हर दिन पितृ दिवस है।
बदला है पहले से परिवेशः पहले से अब पिता की छवि में काफी बदलाव आया है। अब वे अपने बच्चों से खुलकर बातें भी करते हैं और उनकी बातों को पूरे मनोयोग से सुनकर उस पर अपनी परामर्श भी देते हैं। बच्चे भी अपनी बातों को पिता से शेयर करने में जरा भी झिझकते नहीं हैं। वे एक साथ बैठकर खाना भी खाते हैं और टीवी भी देखते हैं। जबकि पहले इस तरह का माहौल नहीं था। पिता के सामने तो बच्चे कभी आते ही नहीं थे। जब वे खाना खाकर चले जाते थे तब बच्चे खाना खाने के लिए आते थे। जरूरत की चीजों के लिए भी पिता के सामने आने की उनकी हिम्मत नहीं होती थी। अगर अपनी बात को पिता के पास पहुंचाना है तो मां के माध्यम से ही यह कार्य सफल होता था।
निःस्वार्थ की भावना:- मां की तरह पिता में भी निःस्वार्थ का भाव होता है। वह अपने बच्चों की खुशी के लिए सब कुछ करने को सदैव तैयार रहते हैं। मां अपने प्यार का इजहार कर देती है,पर पिता का स्नेह दिखाई नहीं देता है। वे अपने बच्चों की खातिर सब कुछ सहन कर लेते हैं ताकि बच्चों को किसी चीज की तकलीफ न हो। लेकिन सब कुछ करने के बावजूद भी पिता से एक दूरी बनी ही रहती है।
कठोरता में है कल्याण:- वैसे तो, मां की अपेक्षा पिता का स्वभाव थोड़ा सख्त होता है, लेकिन उसमें भी कल्याण की भावना ही होती है। वे चाहते हैं कि हमारा बच्चा सही रास्ते पर चलें। जो दुख उन्होंने झेला है वह उनके बच्चे को न भोगना पड़े। पिता ही अनुशासन का पाठ पढ़ाते हैं और इस जीवन की आपाधापी में कदम -कदम पर एक मजबूत पिलर की तरह साथ खड़े रहते हैं। उनके छांव तले जीवन में आने वाली सब दुखों और परेशानियों से निश्चिन्त हो जाते हैं। बच्चों को भी एक भरोसा होेता है कि चलो पापा हैं सब ठीक हो जाएगा। वे प्रोत्साहित भी करते हैं और सुख-दुख में साथ भी देते हैं।
करूणा का सागरः- वे संवेदनशील होते हैं, पर अपने व्यवहार से अपनी भावना को कभी प्रकट नहीं करते हैं। बेटियों को तो अपने पिता पर बहुत ही नाज होता है। उनके लिए तो पिता ही सब कुछ होते हैं, पिता हैं तो मायका है। वह अपने जीवनसाथी में भी पिता की छवि देखती हैं। जब बेटी की विदाई होती है तो पिता की आंखों से आंसू स्वतः बरसने लगती है। चाहे वहां कितने भी लोग क्यों न हों। उस समय वे अपने को रोक नहीं पाते हैं।
प्रस्तुति-संध्या रानी

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