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स्त्रियाँ अब ज्यादा मुखर हैं -नासिरा शर्मा

बँटवारे का दर्द मैंने नहीं सहा लेकिन दूसरों की पीड़ा ने मुझे प्रभावित किया। यह सब देखने के बाद समझ आया कि यह सियासत ही थी, जिसने घरों और आँगनों को बाँटा और इसका शिकार केवल मुस्लिम ही नहीं हिंदू भी हुए।

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साहित्य अकादमी के प्रतिष्ठित कार्यक्रम लेखक से भेंट के अंतर्गत शुक्रवार को प्रख्यात लेखिका नासिरा शर्मा को आमंत्रित किया गया।    उन्होंने श्रोताओं के समक्ष अपनी रचना-यात्रा को तो साझा किया ही, श्रोताओं की जिज्ञासाओं का भी समाधान किया।
     कार्यक्रम के आरंभ में उनका स्वागत साहित्य अकादमी के सचिव के. श्रीनिवासराव ने अंगवस्त्रम् एवं साहित्य अकादमी की पुस्तकें भेंट करके किया।    इस अवसर पर प्रकाशित ब्रोशर का विमोचन नासिरा शर्मा द्वारा किया गया। अपने लेखन अनुभवों को साझा करते हुए नासिरा शर्मा ने कहा कि उनका लेखन बचपन में बँटवारे के ख़ौफ और बाद में पाकिस्तान और चीन से हुई लड़ाइयों से प्रभावित रहा है। ईरान-इराक़ जाने और इन देशों पर लिखने की शुरुआत अचानक ही हुई, उसके पीछे कोई सोची समझी नीति नहीं थी। फ़ारसी जानने के कारण इन देशों तक पहुँचना और उनको समझना आसान हुआ। लंबे समय तक मुझे यह लगता रहा कि मैं समाज को जो देना चाहती हूँ वह नहीं दे पा रही हूँ और मुझे कभी मौत से डर भी नहीं लगा मगर मैं मरना चाहती थी।
     आगे उन्होंने कहा कि हालाँकि बँटवारे का दर्द मैंने नहीं सहा लेकिन दूसरों की पीड़ा ने मुझे प्रभावित किया। यह सब देखने के बाद समझ आया कि यह सियासत ही थी, जिसने घरों और आँगनों को बाँटा और इसका शिकार केवल मुस्लिम ही नहीं हिंदू भी हुए।
      एक प्रश्न के जवाब में उन्होंने कहा कि उस समय जो हिंसा हुई थी वह तो शारीरिक थी लेकिन अब उससे ज्यादा मानसिक हिंसा थी। एक प्रश्न के उत्तर में कहा कि इराक़-ईरान पर मेरे लेखन की चर्चा ज्यादा होती रहती है, जिस कारण दूसरी रचनाएँ पीछे छूट जाती है। स्त्री लेखन पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि मैंने शाल्मली उपन्यास लिखा तब स्त्री विमर्श जैसी कोई चीज़ नहीं थी। मैं स्त्री-लेखन में बदले और प्रतिशोध की भावना से सहमत नहीं हूँ। पहले की तुलना में अब स्त्रियाँ ज़्यादा मुखर हुई हैं। लेकिन गाँव-कस्बों में यह विमर्श अभी पहुँचा भी नहीं है। आज का स्त्री लेखन दूसरों की पीड़ा नहीं देख रहा है बल्कि उन्हें स्वयं की आज़ादी चाहता है, लेकिन आजादी के साथ जो सीमा होनी चाहिए उसे कौन तय करेगा। आलोचना में स्त्रियों की उपस्थिति पर उन्होंने कहा कि अगर महिला लेखन में दम और ईमानदारी है तो वह आलोचना के क्षेत्र में आए, तो उनका स्वागत होगा।
     कार्यक्रम में निर्मलकांति भट्टाचार्जी, राजकुमार गौतम, बलराम, प्रताप सिंह, अशोक तिवारी आदि लेखक, पत्रकार एवं युवा विद्यार्थियों सहित, राँची, देहरादून आदि दूरदराज से आए साहित्यप्रेमी उपस्थित थे।
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